1. [email protected] : admi2017 :
  2. [email protected] : cecilarodius8 :
  3. [email protected] : Somoyer Kontha : Somoyer Kontha
  4. [email protected] : test10154152 :
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শনিবার, ২৩ অক্টোবর ২০২১, ০১:০৬ পূর্বাহ্ন

শীতের অন্যতম অনুষঙ্গ হারিয়ে যেতে বসেছে

  • আপডেট টাইম : রবিবার, ২৪ জানুয়ারী, ২০২১, ৪.৪৯ এএম
  • ৬৪ বার পঠিত

সময়ের কন্ঠ রিপোর্ট।।

  • খেজুর রস

সমুদ্র হক ॥ শীতের অন্যতম অনুষঙ্গ খেজুর রস। শীত মৌসুমে খেজুর রস ও খেজুর গুড়ের স্বাদ না নিলে জীবনটাই যেন বৃথা। যদিও এখন মাঘের শুরুতে শীত আগেই জেঁকে বসেছে। খেজুর গাছে ঠিলা এঁটে রস ধরার ভর মৌসুম এখন। গাছিরা এখন গাছের মাথায়। হলদে পাখিও ঠিলার ওপর বসেছে।

আগাছা ও অবাঞ্ছিত ডালগুলো ছাটা হয়েছে। গাছের মাথার একটু নিচে চাকু দিয়ে চেঁচে বের করা হয়েছে নরম বাদামি অংশ। সেখানেই ছিদ্র করে বসানো হয় নলি। কেউ বলে কপালি। এই ছিদ্র দিয়ে বের হয়ে আসে রস। এর উপরে বাঁশের শক্ত কঞ্চি ও লোহা বসিয়ে বাঁধা হয় ঠিলা বা কলসি। এর মধ্যেই রস চুয়ে পড়ে। বাঙালীর আপন এই আবিষ্কার পরম গৌরবের। কাঁটাময় শুকনো খড়ি মার্কা গাছের বুক চিড়ে সুমিষ্ট যে রসধারা গভীর যতনে বাঙালীর হাতে উদগত হয়ে আসছে তার তুলনা নেই। এই রস ফুটিয়ে তৈরি হয় হরেক রকম গুড়। আর পাটালি গুড়ের সন্দেশ তো খুবই জনপ্রিয়।

বগুড়ার গাছি মন্তেজার বললেন ‘এ্যাডেই খেজুর রসের মরশুম। অগ্রহায়ণ পৌষ মাঘ রস ঝররি।’ নিকট অতীতে উত্তরাঞ্চলে খেজুর গাছের সংখ্যা ছিল কম। খেজুর গাছের মূল এলাকা দক্ষিণাঞ্চলের জেলাগুলো। বিশেষ করে যশোর, মাগুরা, ঝিনাইদহ খুলনা অঞ্চল। হালে উত্তরাঞ্চলের বিভিন্ন এলাকায় খেজুর গাছ রোপণ করা হয়েছে। রাজশাহী অঞ্চলে বেশি। গাছের ডগায় ঠিলা বা কলসিতে রাতভর রস ঝরে। ভোরে তা নামিয়ে আনে গাছিরা। তাদের দক্ষতা ও নৈপুণ্য আরেক শিল্পকর্ম।

কয়েক গাছি বললেন, বেখেয়ালে গাছ কাটাকাটি করলেই বিপদ। গাছ বেড়ে ওঠার অন্তত পাঁচ বছর পর রস সংগ্রহের জন্য কাটা হয়। ঠিকমতো কাটলে একটি গাছ থেকে ২০ বছর রস মেলে। এই রসেরও রকমফের আছে। গাছ কাটার পর প্রথম দিনের রসকে বলা হয় ডাগারকাট রস। কোথাও নলিয়ান। এই রসের ঘ্রাণ মিষ্টি। পরপর তিন দিনের বেশি রস নামনো যায় না। পরের তিন দিন গাছকে বিশ্রাম দিতে হয়। বিশ্রামের এই তিনদিনকে বলা হয় জিরান। কোথাও শুকান। জিরানের পর প্রথম দিনের রস জিরানকাট। পয়লা কাটের রস নামেও পরিচিত। দ্বিতীয় দিনে দ্বোকাট। তৃতীয় দিনে তেকাট।

জিরান কাটের রস দিয়ে তৈরি হয় উন্নতমানের গুড়। তারপর দ্বোকাট ও তেকাট। রাতের রসের নাম ঝরা। দিনের রসের নাম ওলা। দিনের রস টক। পান করলে বিপদ। রাতের রস শীতল মিষ্টি। রস সংগ্রহের রাতে বৃষ্টি হলেই বরবাদ। ঘন কুয়াশায় রসের স্বাদ থাকে না। গুড় তৈরিতে এর প্রভাব পড়ে। রস সংগ্রহ করা হয় ভোরে। এই রসের একটা অংশ বিক্রি হয় পান করার জন্য। আরেকটি অংশ যায় গুড় বানাতে। সকাল বেলা খেজুর রসে মুড়ি খাওয়ার মজাই আলাদা। আর খেজুরের গুড়ের স্বাদ অনন্য।

খেজুর গাছ দু’ধরনের। ছুটনা ও বরাণ। ছুটনা গাছে খেজুর ধরে না। শক্ত ও আঠালো মাটির গাছের রস ঘন। এ দেশের খেজুর ও খেজুর গাছ মধ্যপ্রাচ্যর মতো নয়। দেশের গাছের রসেই তৈরি হচ্ছে সুমিষ্ট গুড়। খেজুরের গুড় বলতেই আগে নাম আসত যশোর, খুলনা, মাগুরার। যেখানে খেজুর বাগান আছে। যশোর অঞ্চলে খেজুরা নামের এলাকা খেজুর গাছের জন্য খ্যাত ছিল। এখন অনেক খেজুর বাগান কেটে মেহেগুনি শিশু সেগুন গাছ লাগানো হয়েছে। খেজুরের গাছে বর্তমানে ভাগ বসিয়েছে রাজশাহী অঞ্চল। রাজশাহীর আরানী, বনপাড়া, ঝলমলিয়া, বানেশ্বর, পুটিয়া, বাঘা, নাটোর জেলার বড়াইগ্রাম সহ কয়েকটি এলাকায় খেজুরের বাগান গড়ে উঠেছে। বগুড়ার পশ্চিমাংশের কাহালু নন্দীগ্রাম দুপচাঁচিয়া, আদমদীঘি, নওগাঁর পত্নীতলা মহাদেবপুরে খেজুর গাছের সংখ্যা বাড়ছে। রাজশাহীতে অনেকে খেজুরের বাগান করেছে। বাগানের ক’জন বললেন, আমের মতো তারাও খেজুরের গুড়ের খ্যাতি আনবেন।

খেজুরের গুড় ও পাটলি গুড় ও সন্দেশের স্বাদই আলাদা। খেজুর রস ফুটিয়ে তৈরি হয় গুড়। এই গুড়ে তৈরি হয় বাহারি পিঠা পায়েশ ফিরনি। খেজুরের গুড় দুধে মিশিয়ে তার মধ্যে চিতই পিঠা ছেড়ে রাত ভর রেখে সকালে খাওয়ার যে স্বাদ ও আনন্দ তা ভোলাই যায় না। এই দুধ পিঠা সকলের প্রিয়। বাংলায় গুড় শব্দটির বয়স দেড় হাজার বছর। প্রভাত রঞ্জন সরকারের শব্দ চয়নিকা বইতে আছে, এটি প্রাচীন বৈদিক শব্দ। সংস্কৃতিতে পাটালি গুড়কে বলা হয় গুড়পট্ট ও গুড় চন্দ্রিকা। এই গুড় কথাটি বলা যত সহজ তৈরি সহজ নয়।

খেজুরের গুড়ের কয়েক কারিগর জানালেন, প্রতি দশ কেজি রস ফুটিয়ে এক কেজি গুড় মেলে। ঠিকমতো তাপ নিয়ন্ত্রণ না করে রস ফুটিয়ে গুড় বানালে মান ঠিক থাকে না। পাটালি গুড়ের সন্দেশের জন্য দরকার দানাদার ঝোলা গুড়। রুটি বা শুকনো খাবারের জন্য ঘন তরল গুড় তৈরি হয়। ঝোলা গুড়ের বড় আড়ত ঢাকার সাভারে। এই গুড় ডাবরে করে যায়।

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